रंग

सूरज अपने अंतिम चरण में था, शाम का मिलन संध्या से होने को था। पार्क में चहल – पहल अभी इतनी तो नही थी , परंतु बच्चे अपने खेलो मे व्यस्त थे । कुछ अपनी उन छोटी -२ साईकिलो को लेकर घुम रहे थे । कुछ बस अपनी टोली बनाकर । दृश्य देखने में सुंदर तो था। कई बार दृश्य भी छलावा हो सकते है।

बच्चों की महक पूरे पार्क को महका रही थी। तभी , एक बच्चे की रोने की आवाज आई , वो एक पापा की परी थी, जो साइकिल से गिर गई थी। तभी उसकी बहन जो उम्र मे शायद उससे बस एक- दो साल ही बडी थी , और खुद 4-5 साल की थी , आई और उसे खडा करने लगी , लेकिन वो चुप नही हो रही थी, फिर एक बुजुर्ग व्यक्ति जो एक छोटे से लड़के को गोदी में लिए हुए थे , आए और उसे चुप करने लगे ।

ऊपर से आवाज आई फिर , बेटा खडी हो जा , कोई बात नहीं , और वो चुप हो गई ; माँ होती ही ऐसी है, जादू – सा भरा होता है आवाज में। लेकिन , जब वो गिरी तो पापा क्यों नहीं आए ? आमतौर से पापा ही साईकिल चलाना सिखाते है।

लेकिन ये आंटी तो वही है जिनके पति की कैंसर से कुछ दिन पहले मौत हुई थी। मुझे उस महिला ग्रुप की बाते याद है ।

एक ने बेचारी बोला तो एक ने थोड़ी सहानुभुति दिखाई । एक कहने लगी , तीन – तीन बच्चो को अकेले कैसे पालेगी , और अभी तो लड़का बस 10 महीने का ही है। बडा ही निर्दयी हो जाता है भगवान किसी – किसी के लिए। एक बच्चा होता तो बच्चे को ससुराल में छोड़कर दूसरा ब्याह कर लेती , पर तीन तीन बच्चे नही छोड़े जा सकते।

दुखद है ऐसे परिवार को देखना , लेकिन जब नियति अपना फैसला सुनाती है तो उसका फैसला स्वीकारना ही पड़ता है।

उन्होंने कभी नही सोचा होगा कि इस जीवनधारा का बहाव इतना जोर पकडेगा की उसको बहा ले जाएगा , अब भले ही वो बहादुर कहलाएं , क्योकि परिस्थितिया उन्हे करेजियस woman बनाने पर तुली हुई है, ये पड़ाव उनका चयन नहीं है। लेकिन इस बहाव ने बहुत कुछ बहाया होगा उनका । क्या महान होना जरूरी बन जाता है ऐसे अवसरो पर ? करे भी तो क्या करे !!

हाँ , किसी ज्ञानी ने कहा है कि हम अपने जीवन को खुद मुश्किल बनाते है, ये मुश्किले कैसे आसान हो? ये तो मैथमैटिकल काट्राडिक्सन आ गई।

अब से शायद उनका पहनना, ओढना , चलना, बाते करना , सब सलोके से करना होगा, क्योंकि गलिया अब थोड़ी तंग है। एक व्यक्ति के अस्तित्व खत्म होने से दूसरे व्यक्ति के अस्तित्व को क्यो जोड़ा जाता है ? ये नियम सिर्फ स्त्री समाज के लिए ही है या पुरुष भी इतने ही प्रभावित होते है!!

खैर! पुरुष के अगर तीन बच्चे हो तो भी कोई एक तो मिल ही जाती है स्वीकार करने वाली , भले ही सौतेली मां बने , पर बनती तो है। ये साहस भी हर किसी के बस की बात नही है। मैंने सौतेली माँ सुना है , पर सौतेला पिता कभी नही सुना, शायद आपने सुना हो !

खैरियत है कि वो एक आत्मनिर्भर स्त्री समाज में है, वरना मुश्किले और बढ सकती थी। जो भी हो, उनके जीवन को समझना इतना आसान नहीं होगा जितना मेरे लिए अपनी उंगलिया चलाना हैं इस शब्दों के पिटारे पर। उनके संघर्ष की कहानी वो खुद लिख रही है। वो शायद साबित करदे कि वो अकेले सब कर लेगी , लेकिन ना दिखाने से क्या सच बदल जाएगा कि तुम्हे भी जरूरत है , जीवन को जीने की , सिर्फ बच्चो के लिए नही , अपने खुद के लिए , किसी समाज के दवाब में आकर अपनी अस्तित्व को खोने से बचाने के लिए लड़ने के लिए , तुम्हे जरूरत है तुम्हारी ! !

परिंदे

मैं और मेरी चाय अक्सर जब साथ होते हैं ,विचार अपनी बुलंदिया छूने लगते हैं। चाय का नाता ऐसा ही है ,हर घूंट थोड़ा सा समय दे देती है ,सोचने का और हर वस्तु को निहारने का । मैं खाली होते हुए कप के साथ ढलती शाम को देख रही थी । वो ढलती शाम बेहद ही सुंदर थी , आसमान हल्की सी लालिमा दे रहा था , बादल चक्रव्यूह सा बनाए हुए थे , ऐसे लग रहा था जैसे किसी ने अपने घुंगराले बाल रंगीन करवा लिए हो । मेरा ध्यान तंग घरो की बाउंड्री को देखने में चला गया , और भरसक प्रयत्न करने के बाद भी नहीं देख पाई कहा तक होंगे ये घर ।

एक घर की छत पर मेरी नजर हर बार जाती है जब भी मै यहां आती हूं, कुछ पल देने के लिए । उस छत का मालिक अपनी छत पर कबूतर पालता है, जिसमे ज्यादातर सफेद कबूतर होते है। वो मालिक प्रतिदिन उन कबूतरों को आज़ाद करता है एक बार ,और वो सारे आसमान का ब्योरा लेकर वापस वहीं आ जाते है , उसी छत पर कैद होने के लिए पर अपनी इच्छा से । शुकर है उनका मालिक थोड़ा दयालु है, वरना क्यों भरोसा करे किसी परिंदे पर ! वो उस छन भर की स्वतंत्रता से प्रसन्न है, क्योंकि उनका दाना भी तो देता है मालिक !! तो इसे प्रेम का पिंजरा कहेंगे या लालच ?

मैं धीरे – धीरे कबूतरो से पैंगना पर चली गई , एक ऊँची- सी ईमारत की पानी की टंकियो पर बेठकर पंचायत सभा बना रही थी , शायद कोई मसला हल करना था उन्हें। कतार में बैठकर शांति से सलाह- मशवरा हो रहा था । इतनी समझ तो इंसानों में भी नहीं है,आजकल परिंदे भी मॉडर्न ही गए हैं। मसला खत्म होते ही वो निकल पड़े अपने घरों की तरफ ,उस गेरुआ रंग के आसमान में।

उन परिंदो को देख रही थी कि नजर एक पेड़ पर गई , अरे अब तो बंसंत भी आ गया , और अब तक इस पर अच्छे से फूल क्यों नहीं आए ?सिर्फ ऊपर ही है कुछ लाल रंग के फूल ।

दूर एक पेड़ को देखा तो उस पर तो सारे पर थे फूल , फिर एक को और देखा , वहा भी गुलाबी रंगो के फूलों से लदा हुआ था पेड़ , फिर इस पर क्यों नहीं है, हो सकता है ये चाहता है कि मै अपने फूलों को किसी को तोड़ने नहीं दूंगा ,पेड़ भावुक हो गया होगा थोड़ा – सा । मै सोच ही रही थी कि क्या वजह होगी ,इतने में मेरी चाय खत्म हो गई … तो वजह ढूंढ ही नहीं पाई ! और अपने प्रिय मित्र की बात याद आ गई ,क्या ही कर सकते है अब !!! ये भी ठीक है । फूल है वहीं बहुत है।

चाय के खत्म होते ही कप को लेकर मै उन सारी गतिविधियों को उनके हाल पर छोड़ कर अपनी गतिविधियों को करने चली गई ।

प्रश्न

ये आसमान कितना साफ है, सारे तारे कितने अच्छे लग रहे है , है ना चाचा’ ; चाचा जैसे कहीं और ही व्यस्त थे। मेरे इस कथन पर ध्यान नही गया उनका।

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मैं यहाँ स्पष्ट करना चाहूँगी कि चाचा शब्द का प्रयोग मेरे नाना जी के लिए हुआ है। दरसल , मैं नाना जी से चाचा ही कहा करती हूँ।

खुले आसमान के नीचे आने वाली निंद्रा बडा ही श्रृंगार करके आती है। मेरी बात नही सुनी गई, तो मैंने जोर से बोला । पहले नाना हुआ करते थे , मेरे हर अटपटे सवालो के जवाबो के लिए , अब दूरी ने थोड़ी दूरी बना दी , तो ये सवाल बस सवाल से रह जाते है।

पहले लगता था कि चाचा के पास हर सवाल का जवाब है, पर ऐसा नहीं था। जो भी मैं स्कूल मे किया करती , उस दिनचर्या के पूरे विवरण को मैं कहानी बनाकर सुनाया करती थी उन तारों की छाव में , और फिर उनका बिना हास्य वाली बातों पर हंसाना और उनका हसना सुनिशिचत था। मैं उनके पास कंधे पर सर रखकर लेट जाया करती थी और फिर अपना दौर और वो कहानिया शुरू हो जाती थी । थोड़ी सी आवाज तेज है तो कृपया माफी दे, उसके लिए।

चाचा, आप सुन रहे हो ना , ये तारे हमारी धरती से कितनी दूर है, अगर जैसे हम जाए , तो कितना टाइम लगेगा । … और वो धुव्र तारा कहां है, सप्त ऋषि तारे कहाँ है? क्या वो खाट के पाई जैसे हैं वहीं हैं क्या? आज मैम ने मुझसे राज्य राजधानी पूछी , मैंने सारी सही बताई , मैम ने फिर मुझसे सुनने को कहा सबसे ।

नाना सब चुपचाप सुनते , कभी कहते ही नही थे कि चलो चुप हो जाओ। नाना सारे सवालो के जवाब बारी-2 देते।

मनीष , तुम चाहो तो वहाँ पहुँच सकती हो, पहले पढ – लिख लो । जब पढ लिख जाओगी तो तुम जा सकती हो। ध्रुव तारा सुबह दिखता है, और सप्त ऋषि तारे वही है तुम्हारी तरफ देखों तो सही, कल भी तो पूछा था।

सवालों का जवाब पाकर मैं शांत नही होती थी। बदले में और जिज्ञासाए उठती थी , और नाना चालाकी दिखाते हुए सोने का छोटा सा नाटक करते थे और मैं समझदारो की परिभाषा पर चलते हुए चुपचाप वहाँ से चली जाती ।

समझ नही आता , पहले प्रश्नो का उत्तर मुश्किल था या अबका , अब के प्रश्नो के उत्तर तो चाचा के पास भी नहीं है। अब प्रश्न सुनने वाला भी कोई नही है । ऐसा नहीं हैं कि निराशा है इस बात की ; नहीं , निराशा नही है, पर आशा करना भी निरर्थक है। बचपन से युवावस्था की कडी ऐसे ही नही टूटती ।

मेरे विद्रोही स्वभाव से बहुत कम लोग परिचित है ।इसी स्वभाव के कारण मैं अक्सर लड जाया करती थी , बचपन में , कभी – कभी नाना से भी। मेरे कुछ प्रश्न उन्हें आज भी परेशान करते हैं जैसे कि समाज समानता का सिद्धात कब अपनाएगा । जब कभी मैं कमजोर होती तो क्रोध अपना स्थान ग्रहण करता , और नाना बस हस दिया करते , शायद वो मेरी नासमझी पर , या फिर मासूमियत पर । अब जो भी हो। अब प्रश्नो की हालत गंभीर है। जीवन की विचाराधारा को बदलने लगे है।

प्रश्र कई बार ऐसे लोगों से भी पूछ बैठती थी , जो शायद बेहतर उत्तर दे सके, पर जनाब उत्तर दिया तो अपने ही पर प्रश्न खडा ना हो जाए , इसलिए वो चुप रहना ही सही समझते । सच का सार्थक रुप सब को पता होता है, पर सार्थक रुप को सच ना कहकर नासमझ और खुद को समाज का मंझा हुआ समझदार समझ लेते है।

जब मैं स्नातक पूरी करके गई , तो फिर वहीं माहौल बना , मेरे सवाल और चाचा का मुस्कुराकर जवाब देना , नानी भी थी हेल्पलाईन के लिए।

हाॅ तो अब तो ग्रेजुएशन भी हो गई, अब बताओ , अब तो मैं पढ़ी लिखी भी बन गई। लेकिन अभी तक तारों तक पहुंचने का रास्ता नजर नहीं आया, और अब आप शादी की भी कहोगे , तो वो रास्ता तो तारो तक नहीं जाता। या फिर आपने मुझे भ्रमित किया , ताकि पढ लिखकर कोई अच्छा लड़का मेरे लिए ढूंढ सको? अगर मैं सही हूँ तो आप बहुत चालाक है ।

नाना नानी साथ में बैठे थे , नाना जोर से हस पडे । कुछ बोलते उससे पहले ही मैं फिर से अपने प्रश्नो की कतार लेकर उनका स्वागत करने लगी ।

माना, इतना पता है कि मैं aeronautics में नही हूँ , पर अब क्या करू , क्या शादी के लिए पढाया , जो आप कहते हो कि घर – परिवार अच्छा मिलेगा । अगर ऐसा नही है तो सच बताइए ना !!!

?

और मैं चुप हो गई। निराशा की डोरी ने मुझे बांध लिया । अबकी बार प्रश्न सही , गलत का नहीं था जो चाचा कहते कि तुम सही हो या गलत । अबकी बार प्रश्न सिर्फ मेरा था और शायद उन सारे माता पिता के लिए जो एक सुरक्षित भविष्य की कामना करते है।

किसने कहा तुम पढी- लिखी हो , इस बात का घमंड है , तो गलतफहमी से बाहर निकलो , तारे तुमने देखे, रास्ता भी तुम्हे ही ढूंढना चाहिए। शादी अगर तुम्हे अभी करनी है तो बताओ , हम तैयार है। तुम्हे शादी के परिणामों से डर लगता है , तो पहले डर को दूर करो । पहले नियंत्रण खुद पर रखो , फिर हर परिणाम पर नियंत्रण होगा ।

मैं चुप हो गई , जैसे चने के झाड पर चढकर जश्न मना रही थी। फिर जैसे सारे प्रश्नो को कैदखाने में कैद कर लिया गया और कहा गया कि अब तुम नजरबंद हो।

नानी की हेल्पलाईन व्यर्थ गई, और नानी अपना हुक्का गुडगुडाते हुए बाहर चली गई , मुझे और नाना को मौन हालातो में छोड़कर ।

प्रश्न शांत कुछ समय के लिए ही होते है , और जब नही होते तो मन विचलित सा हो जाता है। मन ही तो हैं , ये भी शांत हो ही जाता है आखिरकार !

मेला

सोच रही थी कि विचारों को सिर्फ शहरी ही रहने देते हैं, पर विचार कहाँ सीमा का पालन करते  है। दिल्ली मे तो मेले बहुत तरह के होते हैं जैसे Trade fair, Book fair और भी है , पर हमारे यहाँ मेले एक ही तरह के रहते है जिसमें अपनी इच्छाओ वाली चीजे तो मिल ही जाती है। एक मेला , जो एक नारी के सतीत्व की याद में मनाया जाता है, यहाँ भी होता है । कहानी बस इतनी हैं कि जब नारी के चरित्र पर सवाल उठाया जाता है तो वह अपना प्रण दिखाती हैं और जैसे भगवान जी चमत्कार कर देते हैं और वो चमत्कार एक जोर-दार तमाचा होता है समाज पर। फिर समाज गिलानी,अपमान और श्राप से बचने के लिए तोड निकालता है, और अपनी संतुष्टी के लिए उसी चरित्र की पूजा करने लगता है।

Real one

खैर!! ना मैंने चमत्कार देखा , ना मैंने वो तमाचा , मैंने कुछ देखा तो बस मेला , जो बचपन की गुडिया खरीदने के लिए एक दम उचित मौका होता था। वो 10 रु की गुडिया जैसे सबसे कीमती होती थी, और वो ना मिले तो जैसे कुछ नही मिला , फिर तो मेले में कोई जलेबी मुफ्त मे दे , तो भी नही चाहिए । साथ- साथ मन में उमंग की लहरे ,’ मेरी गुडिया के लिए मैं हरे रंग की साडी बनाऊंगी , एक चुनरी बनाऊंगी , और मेरे पास चूल्हा तो है ही , एक गैस चूल्हा भी लुंगी ,और अबकी बार शादी भी सुंदर गुड्डे से करवाऊंगी। ‘ ; बचपन ही दूसरा नाम होता है मासूमियत का ।

वहीं मेला फिर से आया , और पता नहीं कितने ही बच्चो की खवारिश पूरी होनी हैं। मेरी नानी का लगाव थोड़ा ज्यादा ही है मुझसे , उसकी अपनी वजहे है । क्योंकि मेले में जाना था , तो सहभागी भी चाहिए , इसलिए हम छोटी नानी और उनके परिवार के साथ सम्मिलित हो गए। रास्ता थोड़ा लंबा था , मेले से आने वाले और जाने वाले सब थे । भर-भर के लोग ट्रैक्टरो मे आ रहे थे । साथ मे कुछ संगीत भी था। बडा ही मजेदार दृश्य था , अपनी संस्कृति की झलक भी थी , कुछ महिलाए अलग ही परिधान में थी जिसमे पेटीकोट और ओणणा ( चुनरी) पहने हुए थी, जो बडी ही मनोहारी थी। सुबह 4 बजे से शुरु रात तक लगे मेले में खूब चौकड़ी मचती है। मेला सिर्फ एक गांव का नही होता 24 गांवो का होता है, और हर औरत जो इन 24 गाँवों की बेटी या बहु होती हैं , उसका ये पर्व होता है।

Onna

जाहिर सी बात है , इंतजाम भी अच्छे किए जाते हैं। क्योकि पहले मनचले बहुत आते थे, जिनसे अक्सर महिलाजन परेशान हो जाया करती थी। अब थोड़ी कड़ाई रहती है , शायद, अब समाज पढा लिखा भी है। या फिर एक कारण ये भी हो सकता है कि अब चुपचाप सहने वाला स्त्री समाज कम रहा है। जो भी हो , पर पहले से बहुत बेहतर स्थिति हैं।

एक तरफ झूले थे, जिसको देखकर पहले ही गुदगुदी शुरु हो गई। लेकिन पहले मंदिर जाना था , हम वहाँ जा ही रहे थे कि नानी किसी से बाते करने में व्यस्त हो गई। मेला बच्चो के लिए उंमगो की लहरों का किनारा हैं, पर बडे लोग क्यों रुचि दिखाते हैं?क्योकि ये परंपरा का हिस्सा है? शायद ये कारण काफी नही है । कही ये उम्मीद तो नही कि कोई अपना जानकार मिल जाए , जैसा भी है, पर अच्छा है।

My jhulla

नानी पहले उन बूढी नानी से मिली , और बाते करने लग गई ,” और बीबी घर में सब राजी ”

” हाँ, सब राजी “

“बहु बढिया है ? ”

“हाँ , बढिया तो कहां है , पर हैरो है गुजारो “

” आजकल कोई काई की ना झेले बीबी , पर घर तो बसाने है ही , जब रामजी ने गृहस्थ में दिए है तो “

“सही बात है , और सती मैईया नहवा दी ”

“हां, बीबी ,अब चलू “

इस वार्ता के बाद हम चल दिए। हमारी भाषा हरियाणवी नहीं हैं बल्कि थोड़ा बृज भाषा का मिश्रित रूप है। हाँ जी हम बृज क्षेत्र से जुडे हुए है। मेले मे चारो तरफ दुकाने थी। रेडियो में आवाज आ रही थी कि किसी माता की चाँदी की पायल खोई है, वो मंदिर के आंगन में सपर्क करे । मेरी नजर मेरी गुडिया पर पड़ी , पर अब बचपन वाली नही है, जिसके काले जूते होते थे । आखिरकार , काफी धक्खा -मुक्की के बाद हम पहुॅचे, मंदिर खचाखच भरा हुआ था , हम बाहर रुक गए, दोनों नानी कुछ पंडितो को सीधा देने चली गई। बच्चे गोल- गोल गुब्बारे लेकर खुशी से खुद गुब्बारे बने हुए थे। कुछ झूलो पर चिल्ला रहे थे , “मम्मी बचा ले” । गजब का दृश्य था।

नानी के आने के बाद हम वापस घर की तरफ चलने लगे , रास्ते में नानी ने जलेबी ली, जो उन्हे बेहद पंसद हैं, मैंने गोल -गप्पे खाये, कुछ खिलौने भी लिए। अब मैं छोटी बच्ची तो हूँ नही जो गुडिया लूंगी। मैंने बस मेले को अपने नजरिए से देखा, जिसके बहुत रंग देखे और बहुत रह गए। आपने देखे हो तो जरूर बताइएगा उन रंगो के बारें में।

छोटा सा मन

शब्दों की लहरे जिंदगी के बहाव के साथ मेल खाती हैं या नही , ये मै नही जानती । पर मैं अपना पूरा प्रयास करुगी आज का अपना उद्देश्य सार्थक करने का ।

क्योंकी मैं थोड़ी सी आलसी हूं, इसलिए अपने गणित से थोड़ी देर के लिए निवृति लेकर , अपनी बहन के आग्रह पर पार्क जाने लिए तैयार हो जाती हूँ। जाने का रास्ता लंबा तो नही , पर समाज के हर वर्ग का चित्रण बडे अच्छे से करता है। अब चाहे वो बडे-2 बंगले हो या अंदर गली में 2 और 1 BHK फ्लेट हो या फिर पार्क के पिछली तरफ वो छोटे – छोटे तंग घर !

हैरान होने की बात नही हैं कि हर घर में रोटी – सब्जी पेट भरने के लिए ही बनती है। तो फर्क कहाँ है? अब यहां विचार -विमर्श करें तो बहुत पड़ाव मिलेंगे और मिलेंगे और भी सवाल , अब क्योंकि किसी सवाल का जवाब सवाल नहीं हो सकता, तो हम प्रश्न का उत्तर रहने ही देते है।

मैं अपने शब्दों और विचारों को पक्तियो में पिरो रही थी और मेरी नजर मेरी पंसदीदा वस्तु पर पड़ी। ‘गोलगप्पे ‘ ; मुँह में पानी आ जाता हैं , इसमें कोई समझौता नही कर पाती मैं । लेकिन, सर्ब और धैर्य का सहारा लेकर मैं पार्क की ओर बढ चली। पार्क के सामने बडे – बडे साहबो के आर्कषक घर है। और उन घरो के सामने फल और सब्जियो के कुछ ठेले। कुछ जन उन अपने आकर्षक घरो से निकलने में भी संकोच करते है, और मोल भाव का मौका गंवा देते है। ठेले वाले भैईया इस परिस्थिति का पूरा फायदा उठाते हैं। हांलाकि वो ठेले वाले भईया अपने फलों और सब्जियो का मोल उन मकानो की आकर्षकता को देखकर करते है। हाँ , तो उन तंग बस्तियों मे रहने वाले लोगों की परचेजिंग एबिलिटि का आंकलण भी तो किया जाता है। वहां के आंकलण और यहाँ के आंकलण में हर बार Error आ जाता है। इसलिए यहां का माहौल थोड़ा मेंहगा है जनाब!

जिंदगी की भागदौड से विराम लेने के लिए लोग पार्क में भागदौड करने आते हैं। कुछ लोग अपने पालतु पशुओं को भी लाते है, उन्हे कुछ आजादी देने के लिए , जोकि कई बार पूर्ण आजादी नहीं बस कुछ देर का मनोरंजन होता है उनका। मैं कदम बढा ही रही थी कि जोर-२ से हंसने की आवाज आई, असल में ये एक व्यायाम का हिस्सा थी कोई हास्य नही । उसे देखकर थोड़ा व्यायाम मैंने भी कर लिया। रास्ते में कुछ मजदूर भी लगे थे पार्क में , चलो वो भी पार्क आते है। मैंने कुछ देर झूले का आनंद लिया। जब झूले पर होते है तो जो हवा तन को छूती है वो हवा नयी सी लगती है उसका आनंद घी कुछ और है। दरसल मै अकेली नही थी , मेरे साथ मेरे पडोसी भी थे जो हमारी ही उम्र के नौजवान हैं। तभी दूसरे झूले पर मैंने एक औरत को देखा , थोड़ा शरमाकर झूल रही थी वो , झूले के पैसे थोड़े लगते है।

हमने पार्क में निश्चित समय को बिताकर घर की ओर रुख किया। रास्ते को जब मैं अधूरा- सा तय कर चुकी थी तो एक मासूम से बच्चे को एक खम्भे के पास देखा , वही मासूमियत पार्क में खेल रहे उन साफ सुथरे बच्चों के चेहरे पर भी थी। लेकिन !! कुछ और भी था उस खम्भे वाले बच्चे के चेहरे पर, एक छोटी सी उदासी , जैसे कोई छोटी सी ख्वारिश अधूरी रह गई हो जिसे पूरा नहीं किया जा सका। वो छोटा सा दुख उस नन्हे से मन को । और मै उसे उसी हाल में छोड , अपना अधूरा रास्ता पूरा करने के लिए कदम बढा दिए।

मैं भी छोटी सी हिम्मत नही कर सकी कि पैरों को रोककर उससे पूछ लूँ कि चल बता क्या हुआ है !!…!

Unnoticed

…. नोट्स भी लेने है, अनन्या से भी मिलना है, ये रास्ता कहाँ खत्म होता होगा , ये बस कहाँ जाती होगी, क्या कैंप से आगे मुड जाती होगी? आज काम हो जाएगा ना, हो ही जाना चाहिए वरना मैं नहीं आऊंगी , हाॅ तो एक हद होती है एक इंसान की !

तभी जोर से आवाज आई , ओ मैडम जी पीछे सीट खाली है, और मैंने अपने मन मे उठे सवालों से थोड़ी मोहलत मांगकर पीछे मुड़कर बैठना मुनासिब समझा । इस बस से अपनी पंसदीदा जगह , जहां सिर्फ मैं होती हूं और होती है मेरी बाते सिर्फ मुझसे , जाने ही वाली थी कि बैग मे फोन बजा , जो बीच मे आ गया , और फिर मैंने कह दिया कि – जरा और ठहरो !

फोन उठाया और आवाज आई , ” कहां हो”, मैंने बाहर झांका और कहा कि बस १० मिनट और लगेंगे, कहते ही फोन का अलगाव होना जरूरी था।

आजकल DTC की नई बसो का आवागमन है दिल्ली की सड़को पर , जिसमे हर स्टॉप पर announcement होती है। एक के बाद एक स्टॉप आता गया और हर स्टॉप के साथ कुछ पीछली यादों से संबधित बाते मन के दरवाजे खटखटाने लगी, और फिर वही चौराहा आया , बस रेड लाईट के ग्रीन होने के इंतजार में रुक गई, हाँ तो बसे भी इंतजार कर सकती हैं ! क्योकि मैं सिर्फ बस में ही नहीं रह सकती थी , तो वहां से भागना चाहा, मैंने खिड़की अपना जरिया चुना, और मुस्कुराते हुए दो चेहरो पर मैं जाकर ठहरी ।

‘जिंदगी सबके लिए समान नहीं है’ , इस वाक्यांश पर बहस करने का मेरा कोई उद्देश्य नहीं है। वो लड़किया जो अपने उस गोले से अपनी कला का प्रदर्शन लोगों के सामने इस आस में कर रही थी कि कोई गाड़ी वाला अपना शीशा खोलकर उन्हे उनकी कला का इनाम दे सके । पर मंजाल है कोई शीशा खोले , एक लड़की जो शायद उसकी साथी थी , उस पर हस रही थी; वो सहजता स्वभाविक थी । लेकिन क्या वाकई में स्वभाविक थी, या व्यंग्य था ? हर उस पहलू को जो शायद सामने आने थे उस दृश्य को देखने के बाद , को समझने का प्रयास करने ही वाली थी कि मुझे स्टॉप पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा। और वो दृश्य ऐसे ही ओझल हो गया जैसे पानी में पत्थर मारने के बाद उठी लहरे हो जाती है।

मुझे अपनी प्रिय सहेली का कुछ देर और इंतजार करना था । अब इंतजार का समय मैं इंतजार को कैसे दूँ।

दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों के बाहर ई- रिक्शा और रिक्शा चालको की भीड होती है। खासकर विश्वविद्यालय मेट्रो के सामने जो रिक्शा चालक हैं, उनमें कम्पटीशन कुछ ज्यादा ही है । लोगों को मेट्रो से बाहर निकलते ही गिरफ्त में कर लिया जाता है और ‘मैडम’ और ‘सर’ के साथ सम्मानपूर्वक ले जाया जाता है।

वो रिवशा वाले भईया एक लड़के को कहते हैं , ‘आईए सर’ , कहां जाना है? अब वो लड़का कुछ बोले उससे पहले ही एक और आवाज ने बीच मे दस्तक दी ,” ये मेरा है, कहां जाना है।” ; इतने में दूसरे ने धक्का दिया और 2-3 अपशब्द उसे कहे। झगड़ा हो ही जाता कि बीच बचाव हो गया । लड़के को पैदल ही जाना था शायद ! थोड़ा गुस्से में थे वो भैईया पर!!! ग्राहक दूसरे को ना मिलने की खुशी भी। चलो, मुझे ना मिला तो उसे भी नहीं मिला । जीवन की ये सरगम भी अच्छी है, सुखद एहसास तो है।

इतने में ही मेरी प्रिय सहेली आ गई और हमने सहप्रेम आलिंगन करके एक दूसरे का स्वागत किया, और हम चल दिए उन सड़को पर , जिनका अंत मैं नही जानती….

Romance

Okk, After a long time , I finally gather some courage to write something , Actually I wanted to write a blog earlier but not everything that you want get fulfilled.

Today’s weather was awesome. In morning it was little shiny day but it transformed into Romantic in evening . you will think that I have a partner so it seems romantic to me .Buttt you are wrong. My lovely friend laughed when one day I said ‘Aaj mausam bht romantic h’ . (English translation:- ‘weather is very romantic today’)

Is there any kind of text written which justify word #romantic can only be used regarding couple’s love .Check the definition of the word, then we can give justice to our statement.

We begin with the Old French word romanz which meant something like “the vernacular”, “the language that regular people speak”, as opposed to the fancy sort of Latin that was still the main language of writing.

Roman rose

It was around this time that the Romance language speakers began to think of themselves as separate from Latin. The Romance languages aren’t called “Romance” because they sound particularly beautiful or romantic; they come from the language that the Romans spoke.“A romanz language, in other words, before it meant love and adventure, romanz referred specifically to the Old French language.” So , conclusion is here that romance word is a evolutionary word .

Oops ! It (definition ) goes in wrong direction , but definition is definition , you can’t change it. Let’s see another definition that we wish to picturize here. So , for that I Google and I found this ” a feeling or atmosphere or of something new , special and exciting.

Love ❤

So , literally romance doesn’t imply only to love relationship among couples. It’s upto you when u feel attraction towards anything , that’s romance for you . And nature is beautiful , when weather seems pleasant it is romantic…

Roamnace of nature

The One in You

Not now , I don’t want to talk to  you. Just give some time to me.  Look , I m passing through tumult.When I get free ,I will do promptly. Why are you troubling me . Let me sleep plzz .

Silence is everywhere.

Silence

#Dream#
I am running ; A Guy with  charming face chasing me . He is calling to stop me . But I don’t want to listen .” Let me run “,  “But you  have to listen for the sake of yourself if you don’t , you would  atone solely in universe. ” when my brain neurons get the words that he said few seconds ago ,On the spur of the moment ,my feet get arrested to the surface of  earth . In just a bit of moment  , I am facing that guy ,a guy with designer stubble ,a smirk on his pink lips looks like a pink half moon ,dark eyes occupied with vagued light ,shaggy hairs but not red . I am in brown study , he awake me gently with his tender palms and said  softly with  his euphonious voice ,”Take it easy , assimilate the  One in You”.

A candle in a Caze

With a jerk, I got up , ” was it a dream ? “
whilst I got free from wiping my thoughts from my forehead , I palpate the guy ,” The One in Me ” .Now I could feel the intuition that he want to give me.

Lamp(Diya)

Now , I want to  talk with you. Spare some time with me also .
“Let the cat out of the bag”